स्कूल का बैंड शानदार था
परेड के लिये हर किसी ने तैयारी की थी। वे तो पिछले कई दिनों से उसमें जुटे थे। उन्होंने सोचा था कि इस बार बहुत अच्छा होगा।
यह स्कूल का पहला बैंड था जिसमें नितिन, नारायण जैसे बच्चे शामिल थे। शिल्पी चौधरी बैंड को लीड कर रही थी। बच्चों की ड्रेस गुलाबी रंग की थी जिसपर खूबसूरत धारियां बनी थीं। देखने में हमारे स्कूल का बैंड शानदार बन पड़ा था। उनके बजाने के उपकरण देखने में किसी पीपी की तरह लगते थे जिसे दो साल का बच्चा भी फूंक मारकर बजा दे, लेकिन ऐसा नहीं था। उसके लिये प्रशिक्षण की जरूरत थी।
मैं बैंड का हिस्सा नहीं था। ऐसा हो नहीं सकता था क्योंकि मैं ऐसे कार्यों से हमेशा दूर रहता था। उस समय यह एक तरह से नीरस कार्य लगता था मुझे। दिन भर घूमते रहो। धूप-छांव का अंतर मत जानो, सिर्फ प्रशिक्षण देने वालों की सुनतो रहो। मैं यह किसी कीमत पर कर नहीं सकता था। मैं विद्रोह कर नहीं सकता था, न मैं करता। जिस चीज को करने की आप में अंदर से इच्छा न जागे उसे कभी मत करिये। किसी के दबाव में काम करना व्यक्ति की क्षमता को क्षति पहुंचाना है। बैंड में कुछ बच्चे ऐसे थे जिन्हें जबरदस्ती उसमें शामिल किया गया था। मजेदार यह था कि हम उस स्कूल की बात कर रहे हैं जहां शिक्षा के मापदंड बहुत ऊंचे रहे हैं। कई बार ऐसी स्थिति में दबाव महसूस हो सकता है।
स्कूल का बैंड शानदार था। जब बच्चे पंक्ति में चलते तो नज़ारा कुछ ओर ही होता। 26 जनवरी या 15 अगस्त की परेड पर बैंड की सलामी ली जाती।
एक बार किसी ने बताया कि बैंड के कुछ सदस्य बीमार हैं। उनकी किसी तरह भरपाई की गयी। एक बार नहीं कई बार बीमार होने पर भी बच्चों ने बैंड के साथ परेड की। उन्हें हौंसला देने वाले टीचर कम नहीं थे। कुछ टीचर अपनी बात आगे रखने की जुगत में रहते ताकि प्रिंसिपल को लगे कि वे बेहतर काम कर रहे हैं। ऐसे टीचर बच्चों को क्या शिक्षा दे पाते होंगे। उनमें चापलूसी और धूर्तता का अद्भुत संगम था। वे मौका परस्त भी थे। उनके लिये बच्चे किसी सामान की तरह थे जिसे जैसा चाहें पेश किया जा सकता था।
कई बच्चे कभी खुलकर नहीं कह पाये कि उन्हें बिना मतलब लंबी परेड करवायी जाती है। वे दबी जुबान में जरूर यह मानते थे कि किसी खडूस टीचर का इसमें हाथ है।
नारायण में जोश था। वह कर सकता था। वह कुछ भी कर सकता था। उसका जस्बा उसे बैंड का मजबूत सदस्य बनाता था। नितिन का चेहरा मासूम था। वह अपनी मुस्कान के लिये भी लड़कियों में जाना जाता था, यह शायद लड़कियां ही बेहतर बता सकती थीं।
मैं यह पक्के यकीन से कह सकता हूं कि नितिन के ख्बावों का मेला हमेशा सजा रहता था क्योंकि वह भविष्य की योजनाओं के बारे में फिक्रमंद था। वह खुलकर न कहता हो लेकिन उसके भीतर जो उथलपुथल रही होगी वह उसे बैंड की दुनिया से अलग संसार में ले जाती थी। नारायण का साथ उसे जोड़े रखता था।
मुझे आज भी याद आता है जब वे तन कर चलते। टोपी और ड्रेस, क्या जंचते थे सभी। स्कूल का बैंड कमाल का था। लेकिन जो मेहनत उनसे करवाई गयी थी वह कुछ ज्यादा थी।
आज वे उसे माने या न मानें लेकिन मैं यही राय रखता हूं। उनके समय किसी से कभी हिसाब नहीं मांगा जायेगा। वे तब भी तन कर चलते थे। आज भी उनके हौंसले बुलंद हैं।
-हरमिन्दर सिंह चाहल.
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