सपने में स्कूल की सैर

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मैं आजकल सपने में अपने स्कूल की सैर कर रहा हूं। मुझे पता नहीं घबराहट क्यों होती है? मेरे क्लासमेट भी उन दिनों वाले ही होते हैं। उनसे ढेर सारी गपशप होती है जो शायद पहले नहीं हो पाती थी।

मैं सपने को हकीकत मानने लगता हूं। बस में सफर कर रहा हूं। स्कूल-बैग मेरे बगल में है। इतना जरुर है कि सीट पर मैं अकेला हूं।

एक बार एक्साम देना गया तो अपना एडमिट कार्ड लाना भूल गया। मेरी हवाईयां उठ जाती हैं। जबकि दूसरे सपने में जब मैं प्रश्न-पत्र देखता हूं , मेरा चेहरा बुझ जाता है। उसका कारण होता है उन प्रश्नों का आना जो मैंने पढ़े ही नहीं। आइ एम कम्प्लीटली आउट आफ माइंड। फिर इधर-उधर देखने के सिवा कोई चारा नहीं बचता।

कई बार तो मैं रंजना दूबे जी के सामने भीगी बिल्ली की तरह खड़ा रहा। शुक्र था उनके कुछ कहने से पहले ही मेरी आंख खुल गयी।

सपने में स्कूल की सैर करने की कोई खास वजह मुझे नजर नहीं आती। एक बात तो है कि यह इसलिए हो रहा होगा कि जिस स्कूल में आपने बारह साल गुजारे उससे एक लगाव होता है। नर्सरी से दसवीं तक बहुत वक्त होता है। आपको लगता है कि अब वह आपका दूसरा घर है। वह बात भी सही है क्योंकि आप आधा समय स्कूल में बिताते हैं। कई सहपाठी शुरुआत से आखिरी क्लास तक आपके साथ रहते हैं। उनसे जुड़ाव होता है। उसी तरह शिक्षक भी होते हैं। कुल मिलाकर यादों में आप उन पलों को संजो कर रखते हैं जो शानदार थे। मैं यादों में उन्हें जीता हूं और अब सपने में सैर कर रहा हूं। लेकिन सपने में अभी खूबसूरत पल नहीं आये क्योंकि सपने शायद ‘टेस्ट सिग्नल’ की तरह काम कर रहे हैं।

-हरमिन्दर सिंह चाहल.

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